उपवास कोई दिखावा नहीं बल्कि स्वयंसिद्धि का तरीका

धर्म-पंचैत

अम्बुज टाक, जयपुर।

महात्मा गांधी (mahatma gandhi) और नवरात्रि में एक खास संबंध है, और वह संबंध है, ‘उपवास’ का ।

गांधी जी के आंदोलनों का एक अहम हिस्सा उपवास करना था । वहीं नवरात्रि में हिन्दू धर्म में आस्था रखने वाले लोग उपवास रखते हैं। ‘उपवास’ दो शब्दो से मिलकर बना है ‘उप’ यानी ‘नजदीक’ और ‘वास’ यानी ‘निवास’ या ‘घर’ । ‘उपवास’ का शाब्दिक अर्थ हुआ ‘नजदीक में घर’ किन्तु ऐसा ना होकर ‘उपवास’ का अर्थ है ‘स्वयं के नजदीक जाना’ अर्थात् ‘आत्मा के नजदीक जाना’ । ‘उपवास’ का एक रूप ‘व्रत’ भी है जिसका अर्थ ‘प्रतिज्ञा’ है ।

हमारा शरीर और मस्तिष्क दोनों कुछ ना कुछ मांग करते रहते हैं । जब हम उससे ऊपर उठकर कुछ प्रतिज्ञा करते हैं तो वही ‘व्रत’ है । जब यह किसी अवधि के दौरान किया जाए तो ‘उपवास’ कहलाता है । जब हम शरीर या मस्तिष्क की मांगों से ऊपर उठकर खुद पर नियंत्रण कर पाते हैं, तो आत्म जागरण की दैवीय अनुभूति होती है । उपवास या व्रत ईश्वर से कुछ मांगने के लिए नहीं किए जाते बल्कि स्वयं को स्वयं और मानवता के करीब ले जाने के लिए किए जाते हैं । मनुष्य के पास चयन का गुण होता है | यही चयन उसके चरित्र का कारण बनता है । जब हम जैविय गुणों को त्याग मानवता का वरण करते हैं तो स्वयं में सात्विकता का समावेश कर पाते हैं। यही सात्विकता ‘व्रत’ और ‘उपवास’ करने से मनुष्य के जीवन में समाहित होती है ।

महात्मा गांधी की 150 वी पुण्यतिथि पर गांधी जी को विभिन्न कारणों से याद किया जा रहा है । उनके जीवन चरित्र में अहम योगदान उनके उपवासों का भी है । वे स्वयं कह चुके थे कि ” उनकी ऊर्जा का राज उनके उपवास है ।”

“नवरात्रि के पावन अवसर पर आज की युवा पीढ़ी को उपवास या व्रत के वैज्ञानिक और धार्मिक महत्व को समझ,आत्मिक रूप से स्वयं के भीतर , यह गुण समाहित करना चाहिए । उपवास या व्रत कोई दकोसला नहीं वरन् स्वसिद्धी को प्राप्त करने का तरीका है ।”

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