कुर्सी, कलम दवात पूछे अपने निशान, कहां मेरा वतन कहां मेरे निशान…

जिया खिलाड़ी

शहीद भगत सिंह के जन्म दिवस पर खास रिपोर्ट

आजकल भगत सिंह फैशन के साथ देश भक्ति दिखाने के लिए ज्यादा ही ट्रेंड कर रहे हैं कोई भगत सिंह की टी-शर्ट तो कोई फोन कवर लगाकर उन्हें दिल में बसाने का दम भरते हैं, लेकिन आज अपने ही देश में भगत सिंह को अंजान कर दिया है। भगत सिंह की कुर्सी, कलम दवात से लेकर सभी सामान अपने ही देश में अपने शहर में अपना अस्तित्व खोज रहा है। न तो नेताओं को न ही देश के युवाओं को भगत सिंह की यादें सहजने का समय है न ही उसे ढू़ढ़कर आने वाली पीढ़ी के लिए रखने का समय। हम बात कर रहे हैं कानपुर में भगत सिंह के बिताएं पलों की जहां आज नेता तो क्या वो तथाकथित लोग भी नहीं जाते हैं जो भगत सिंह को अपना आदर्श बताते हैं। आज शहीद भगत सिंह के जन्मदिन के मौके पर द जर्नलिस्ट्स की खास रिपोर्ट-

प्रताप प्रेस की बिल्डिंग

धूल खा रही है भगत सिंह की बैठने की कुर्सी
भगत सिंह जिस कुर्सी पर बैठकर लिखते थे, वह आज भी फीलखाना की टूटी-फूटी इमारत में रखी है। जहां वे स्नान किया करते थे, वह सब सामान पांच मंजिला इमारत में मौजूद हैं। प्रताप अखबार तो अब नहीं छपता, लेकिन वह मशीन सहित वह कलम भी बिल्डिंग में रखा गया है।

सिंह कहा करते थे कि- कानपुर के लोगों में आग है, सिर्फ आजादी की माचिस से आग लगानी है। वहीं, कानपुर के आसपास के जिलों के लोग गांधी जी की अहिंसा वाली नीति के खिलाफ थे और पंडित चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह की नीति के कायल थे।

राम नारायण बाजारा का कमरा

राम नारायण बाजार में रहे भगत सिंह
भगत सिंह राम नारायण बाजार में किराए के मकान में रहते थे, प्रताप प्रेस में नौकरी मिल गई थी और कुछ दिन शहीद ने प्रताप प्रेस की बिल्डिंग में रहे, लेकिन मैनेजमेंट ने उन्हें कमरा लेने के लिए कहा। तब उन्होंने रामायण बाजार में एक आना हर माह किराया पर कमरा लिया। वो कमरा आज भी उसी तरह राम नारायण बाजार में भगत सिंह के जुनून और उत्साह की कहानी सुना रहा है लेकिन दुख यह है कि कोई उसे सुनने वाला नहीं बचा है।

बिठूर कस्बे में बनी मीनार
बिठूर कस्बे में बनी मीनार

एसेंबली बम धमाके के लिए जबरदस्ती कराया था अपने नाम का चयन
लाहौर एसेंबली में बम फेंकने की योजना बिठूर कस्बे में बनी मीनार के अंदर 30 मार्च 1929 को योजना बनाई गई थी। उस समय पंड़ित चंद्रशेखर को सभी लोग अपना नेता मानते थे। चंद्रशेखर आजाद ने भगत सिंह को लाहौर में बम फेंकने से मना कर दिया और वह मान भी गए थे। यदि इतिहासकारों की माने तो जब चंद्रशेखर आजाद ने लाहौर जाने के लिए किसी और को चुना था। आजाद यह मानते थे कि दल को भगत सिंह की बहुत जरुरत थी, लेकिन भगत सिंह के मित्र सुखदेव ने भगत सिंह पर ताना कसा कि वे उस लड़की के कारण बम फेंकने नहीं जा रहे हैं। भगत सिंह इस ताने से काफी दुखी हुए। उन्होंनें दबाव बनाकर अपना चयन करवाया।

भगत सिंह से प्रेरित कविता-

हुआ देश का तू दुलारा, भगत सिंह ।
झुके सर तेरे आगे हमारा, भगत सिंह ।

नौजवानों के हेतु हुए आप गांधी,
रहे राष्ट्र के एक गुवारा, भगत सिंह ।

किया काम बेशक है हिंसा का तुम ने,
यही दोष है इक तुम्हारा, भगत सिंह ।

मगर देश हित के लिए जान दे दी,
बढ़ा शान तेरा हमारा, भगत सिंह ।

तेरी देशभक्ति पे सब हैं निछावर,
“अभय” तेरा साहस है न्यारा, भगत सिंह ।

हुआ देश का तू दुलारा, भगत सिंह
झुके सर तेरे आगे हमारा, भगत सिंह ।

कुछ याद उन्हें भी कर लो…

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