तुम अगर मेरे गांव की लड़की होती­…

साहित्य समागम

 

तेजस ठाकुर की कलम से…

तुम अगर मेरे गांव की लड़की होती­…

सोचो क्या होता अगर तुम मेरे गांव की लड़की होती

मेरे गांव का हर लड़का तुम्हारे मोहल्ले के चक्कर लगाता
पता होता तुम्हारे कॉलेज से कोचिंग जाने तक का वक्त

हर क्रिकेटर की ख्वाहिश तुम्हारे घर तक सिक्स मारने की होती,
तुम्हारा मोबाइल नंबर कोहिनूर से ज्यादा कीमती हो जाता

अगर तुम मेरे गांव की लड़की होती…

तुम्हारे भाई को मिलती हर मैच में ओपनिंग बैटिंग

और हर लड़के से रोजाना ढेरों चाकलेट
तुम्हारे मोहल्ले के सारे लड़कों से होती पूरे गांव की दोस्ती

तुम्हरी वाली कोचिंग में लगता पूरे गांव के लड़कों का मजमा,

अगर तुम मेरे गांव की लड़की होती…

होली पर तुम्हारे गालों को रंग लगाना हर एक का ख्वाब होता
रोजाना तुम्हे हंसाने की बेवजह कोशिशें होती

कश्मीर की तरह हर एक तुम पर अपना दावा करता
और तुम्हारे हर बेफिजूल इशारे का मतलब निकाला जाता,

अगर तुम मेरे गांव की लड़की होती…

मैं भी देखता तुम्हे एक हारे हुए सिपाही की निगाहों से
तुम्हारी सब्ज स्याह सी आंखों की गहराई को

तुम्हारी तीखी नाक और पंखुरी जैसे ओठों को

मैं महसूस करता तुम्हारे उड़ते हुए गेसुओं को,

अगर तुम मेरे गांव की लड़की होती…

तुम्हारी इक निगाह के लिए खुद को घंटों संवारता

  • वक्त से पहले पहुंच जाता हर उस जगह जहां तुम जाती हो
    तुमसे टकराते ही नजर से नजर झुका लेता अपना सिर

होता निढाल ऐसे जैसे हारा हुआ सिपाही रख देता है अपनी तलवार,

ऐ काश के तुम मेरे गांव की लड़की होती…

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