अब सरफरोशी की तमन्ना करना ही बेकार है…

साहित्य समागम

अगर आज के परिदृश्य को क्रांतिकारी देखते तो वो किस तरह अपनी भावनाओं को व्यक्त करते, उनकी वेदना को प्रकट करती कविता “निसर्ग दीक्षित” की कलम से…

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फांसी के तख्त चूमे गोली बदन पे खाई है
तब कहीं जाकर ये आजादी वतन में आई
पर आज के मंजर को देख दिल मेरा घबरा गया
रोशन सुबह की खोज थी काला अंधेरा छा गया
तन हुआ है राख पर रूह ने भरी हुंकार है
अब सरफरोशी की तमन्ना करना ही बेकार है

तब के सियासी शोर में उठती थी आवाज़ भी
अब के इस माहौल का अपराध है आगाज़ ही
वादों के तीरों से प्रजा को मारना अब छोड़ दो
कर सको जो कुछ भला द्रोह के घरौंदे तोड़ दो
फिर उदाहरण दूं तुम्हे, कर दूं किसी की पैरवी
छोड़ कुछ दिन मंचों को पूछो किसी की खैर भी
सेवा का वादा किए फिर से नदारद हो गए
नेताजी अब के कि बेमौसम की आमद हो गए
खादी हो उम्मीद तुमसे रखना निराधार है, मजबूरयां भी बन गईं फितरत में ही सत्कार है
अब सरफरोशी की तमन्ना करना ही बेकार है

नारों के शोरों गुलों में झूमते आवेश में
जांबाज है युवा अभी के भेड़ियों के भेष में
हम भी थे युवा गुलामी रौंदते थे तैश में
मिट्टी की तासीर है ये खूबी मेरे देश में
कि अब कहां अश्फाक ओ बिस्मिल, अब कहा आजाद हैं
मद में डूबा होश है और नौजवान बर्बाद है
जंग लगते हौंसलों के हाथों में तलवार है पर इंकलाबी ख्वाब अब ना हो रहा साकार है
अब सरफरोशी की तमन्ना करना ही बेकार है

हैं जो कुछ बागी से दहशत की हवा में बह रहे
मजहबी शेरों को आतंकी जबां में कह रहे
हमको तो खूं से सनी गजले ही बस याद थी
तीन रंगों को जो पूजे कौम वो आबाद थी
अपने ही नीड़ों में युद्ध ले रहा आकार है, धर्म जाती भेद का बढ़ता खुला व्यापार है
मां का आंचल सून है, नफरत की गली गुलजार है
अब सरफरोशी की तमन्ना करना ही बेकार है

एहसान के मोहताज नहीं हम में अब भी वही आवाज है
कमजोर तू है मूक तू शोषित तेरा समाज है
तेरी आज़ादी की खातिर बेघर ही कोई मर गया
और तेरे घर की बेहतरी ही तेरा स्वराज है
तुझमें है खामी ना कोई बस बुद्धि का विकार है कि जड़ तलक समाप्त हैं पर खौफ बरकरार है
अब सरफरोशी की तमन्ना करना ही बेकार है

वक्त को तू थाम ले खुद को नई उड़ान दे, तू भारतीय वीर है मुमकिन तेरा बखान दे
इक शपथ तो ले जरा ये हाथ अब बढ़ा दे तू, तू कौन है आवाज से ललकार से जता दे तू
क्यों लापता सा खुद हुआ ये ओज तेरे साथ है
कि सूर्य खुद तू बन जरा क्या तिमिर की औकात है
ना ढाल खुद को सांचे में तू शख्स निराकार है
जो प्राप्त है पर्याप्त है हर सितम भी स्वीकार है
विरासत में हैं मिली कुछ जंगी हुनरदारियां
हथियार ही अब यार है, प्रहार ही व्यवहार है
तू सरफरोशी की तमन्ना के लिए तैयार है…

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