लगा ज़ोर सूरज दिखला दे…

साहित्य समागम

कुलदीप शर्मा, विदिशा।

उठाले अपनी सख़्त भुजाएँ

दिखादे अपनी सभी कलाएँ

लाँघ दे सारी बनी हदों को

तोड़ दे सारी खड़ी शिलाएँ

आज अँधेरा अभी मिटादे

लगा ज़ोर सूरज दिखलादे

आज नहीं तो कब निकलेगा

हर पल अंधियारा छिछलेगा

आयी हर मुश्किल पछाड़ दे

उठा क़दम पर्वत उखाड़ दे

जो रोके वो हिम पिघलादे

लगा ज़ोर सूरज दिखलादे

कर्म ही तेरी पूजा भक्ति

झोंक दे अपनी सारी शक्ति

सम्मुख मंज़िल बुला रही है

वही है तेरी अंतिम मुक्ति

स्व क्षमता जग को दिखलादे

लगा ज़ोर सूरज दिखलादे…


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