भारतीय साइंस फिक्शन फिल्में और हॉलीवुड से प्रतियोगिता…

सितारे भौकाली

शुभम सोनकर, दिल्ली।

मूवी, फिल्म, पिक्चर, सिनेमा – इन शब्दों का स्वरूप भले ही अलग है लेकिन मतलब एक ही है। कम-से-कम भारत में तो इन शब्दों का एक ही मतलब है। कोई फिल्में दिखाकर अपने दो वक्त की रोटी का इंतजाम करता है, तो कोई दो वक्त की रोटी का इंतजाम करने के बाद थोड़ी-सी राहत पाने के लिए फिल्में देखता है। सिनेमा न केवल मनोरंजन है बल्कि अलग-अलग संस्कृतियों को समझने का साधन भी है।

भारतीय सिनेमा का इतिहास 100 सालों से ज्यादा पुराना है। जब देश आजादी के लिए संघर्ष कर रहा था, तब पारसी थिएटरों को पीछे छोड़ते हुए मनोरंजन के नए स्वरूप सिनेमा का आगाज हुआ। सबसे पहले लुमेयर बन्धुओं ने 7 जुलाई 1896 को मुंबई के वॉटसन होटल में छह मूक फिल्मों का प्रदर्शन कर भारत में ‘सिनेमा’ की शुरुआत की। लेकिन ‘भारतीय सिनेमा’ की शुरुआत दादा साहब फाल्के ने सन् 1913 में मूक फिल्म “राजा हरिश्चन्द्र” से की। तब से लेकर आज तक भारतीय सिनेमा नई कहानियों के साथ लगातार आगे बढ़ता जा रहा है।

फिल्म राजा हरिश्चंद्र का एक दृश्य।

आम तौर पर भारतीय सिनेमा को लोग केवल हिन्दी सिनेमा या बॉलीवुड के नाम से पहचानते है, जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। भारतीय सिनेमा; हिन्दी, तमिल, मराठी, पंजाबी, भोजपुरी समेत कई अन्य भाषाओं में बनने वाली फिल्मों का मिश्रण है। पूरी दुनिया में प्रति वर्ष सबसे ज्यादा फिल्में भारत में बनाई जाती है, इसके बाद नाइजीरिया, हॉलीवुड और चीनी सिनेमा का स्थान आता है।

दुनिया के करीब सभी देशों के फिल्म उद्योगों पर हॉलीवुड का वर्चस्व रहा है लेकिन भारत में इसका उस हद तक प्रभाव नहीं दिखा है। ऐसा नहीं है कि भारत में हॉलीवुड की फिल्में नहीं देखी जाती है, बल्कि हॉलीवुड फिल्मों का एक ईमानदार दर्शक वर्ग हमेशा इनके फिल्मों के इंतजार में होता है। हॉलीवुड फिल्में भारत में अच्छा-खासा व्यापार करती है लेकिन ये फिल्में भारतीय फिल्मों के व्यापार पर ज्यादा असर नहीं डाल पाती है। हॉलीवुड के फिल्म निर्माता भी अक्सर उसी समय अपनी फिल्में रिलीज करते है जब कोई बड़ी भारतीय फिल्म थिएटरों में नहीं होती है।

पिछले कुछ समय से भारत में भी दर्शकों का रुझान हॉलीवुड फिल्मों की ओर बढ़ा है। ऐसा होने के दो मुख्य कारण है- पहली, यह कि भारतीय फिल्मों की विषयवस्तु में अब काफी गिरावट आयी है। हिन्दी फिल्मों की बात करें तो यहां कहानी कुछ ही फिल्मों में मिलती है, जिसकी वजह से बॉलीवुड में रीमेक का दौर-सा चल पड़ा है। कहानियों की नकल तो होती ही है, अब तो धड़ल्ले से गानों की भी नकल होने लगी है। इसीलिए दर्शक भी एक तरह की फिल्में देखकर ऊबने लगे है। ऐसे में दर्शकों का हॉलीवुड की ओर रुख करना लाजमी है, जहां कहानियां भी है और रोमांच भी।

दूसरा सबसे बड़ा कारण है-

हॉलीवुड की बड़ी फिल्मों का वैज्ञानिक सोच पर आधारित होना या यूं कहें कि इन फिल्मों की कहानियों का विज्ञान के ही इर्द-गिर्द बुना होना। इस तरह के साइंस फिक्शन (साई-फाई) फिल्मों की कहानी दर्शकों की कल्पना से परे होता है जो दर्शकों को रोमांचित करता है। विज्ञान पर आधारित होने की वजह से इन फिल्मों को बनाने के लिए खास तरह के इफेक्ट्स का प्रयोग करते है जिसे विजुअल इफेक्ट्स (वीएफएक्स) कहते है। वीएफएक्स के इस्तेमाल से ये फिल्में और ज्यादा दिलचस्प हो जाती है। हॉलीवुड की बहुप्रतिष्ठित फिल्म अवतार को ही ले लीजिए। यह एक साई-फाई फिल्म है और साई-फाई परिकल्पना के साथ इस फिल्म का दृश्यांकन ऐसे किया गया है कि फिल्म देखते समय दर्शकों के रोंगटे खड़े हो जाते है। अब, जब दर्शकों के पास इस तरह की और भी फिल्में हॉलीवुड में मौजूद है जो कि भारतीय सिनेमा में लगभग नहीं ही है, तो जाहिर है कि भारतीय दर्शक भी हॉलीवुड की ही फिल्मों को देखना पसन्द करेंगें।

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दक्षिण भारतीय फिल्मों ने की भारत में साई-फाई फिल्मों की शुरूआत  भारतीय सिनेमा का एक अहम् हिस्सा दक्षिण भारतीय फिल्में है।

एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2013 में 1600 से ज्यादा फिल्में बनी थी, जिनमें सबसे ज्यादा संख्या तमिल फिल्मों की थी।”

दक्षिण भारतीय साई-फाई फिल्मों पर नजर डालें तो 1952 में भारत की पहली साई-फाई फिल्म ‘काडु (द जंगल)’ थी। यह तमिल और अंग्रेजी भाषा में बनी एक भारतीय-अमरीकी फिल्म थी, जिसका निर्देशन विलियम बर्के और टी. आर. सुन्दरम ने किया था। इसके बाद ए. कासिलिंगम के निर्देशन में दूसरी साई-फाई फिल्म ‘कलाई अरसी’ बनी। 1986 में राजाशेखर निर्देशित फिल्म ‘विक्रम’ तमिल भाषा में बनी साई-फाई फिल्म थी। भारतीय सिनेमा में पहली बार इसी फिल्म में गानों की रिकार्डिंग के लिए कम्प्युटर का इस्तेमाल किया गया था। समय-समय पर दक्षिण भारत में ‘नलाया मनिथन’ (तमिल, 1989), ‘अधिसाया मनिथन’ (तमिल, 1990), ‘आदित्य 369’ (तेलुगु, 1991) जैसी साई-फाई फिल्में दक्षिण भारतीय सिनेमा में बनती रही है। कन्नड़ भाषा में बनी इकलौती साइंस फिक्शन फिल्म ‘हॉलीवुड’ 2002 में आई थी, जिसका निर्देशन दिनेश बाबू ने किया था। 2010 में एस. शंकर द्वारा निर्देशित फिल्म एंधिरन ने भारतीय साई-फाई फिल्मों को नया रूप दे दिया।

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रजनीकांत’ अभिनीत इस फिल्म ने ना सिर्फ बेशुमार सफलताएं प्राप्त की बल्कि भारतीय सिनेमा में अपनी एक अलग पहचान बना ली। इस फिल्म को हिन्दी में डब करके रोबोट नाम से रिलीज किया गया, जिसने हिन्दी सिनेमा में भी धूम मचा दी। 2011 में ‘7आम अरिवु’, 2012 में ‘अम्बुली’, 2013 में ‘इरंदाम उलागम’, 2015 में ‘आई’ और ‘इन्दु नेत्र नलाई’, 2016 में ‘मिनिथन’ और ‘24’ जैसी फिल्मों के साथ दक्षिण भारतीय सिनेमा में साई-फाई फिल्मों का दौर चल पड़ा है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि दक्षिण भारतीय सिनेमा में शेष भारतीय सिनेमा के मुकाबले विज्ञान और तकनीक पहले पहुंचा है और दक्षिण भारतीय सिनेमा को इसका फायदा भी हुआ है।

बंगाली और मराठी फिल्मों में भी साई-फाई फिल्मों की शुरूआत रही अच्छी

भारतीय सिनेमा में पहली साई-फाई बंगाली फिल्म ‘अजांत्रिक’ रित्विक घटक ने 1958 में बनाई थी। इसके बाद “सत्यजीत रे” ने 1960 के दशक में एक भारतीय-अमरीकी साई-फाई फिल्म ‘द एलियन’ बनाने की शुरूआत की लेकिन यह फिल्म पूरी नहीं हो सकी। इसके बाद बंगाली फिल्मों में काफी अंतराल के बाद 2003 में अभिजीत चौधरी ने साई-फाई फिल्म ‘पातालघर’ बनाया। बंगाली फिल्मों के इतिहास में आखिरी साई-फाई फिल्म ‘फ्रेन्ड’ सताब्दी रॉय ने 2009 में बनाया।

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मराठी फिल्मों में साई-फाई फिल्मों की शुरूआत 1967 में “करूथा रात्रिकाल” से हुई। इसके बाद 1987 में ससि कुमार निर्देशित फिल्म ‘जैत्र यात्रा’ आई। इस फिल्म के बाद मराठी फिल्म जगत में काफी समय के बाद आखिरी दो साई-फाई फिल्में ‘भारतन इफेक्ट’ और ‘जबरदस्त’ आई।

बॉलीवुड भारतीय साई-फाई फिल्मों को वैश्विक सिनेमा में ले गया

बॉलीवुड में साई-फाई फिल्मों की शुरूआत दक्षिण भारतीय फिल्मों के मुकाबले काफी बाद में हुई। बॉलीवुड की पहली साई-फाई फिल्म मिस्टर एक्स इन बॉम्बे “शान्तिलाल सोनी” ने 1964 में बनाई। इसके बाद 1967 में टी. आर. सुन्दरम निर्देशित साई-फाई फिल्म “चाँद पर चढ़ाई” आयी। 1971 में एक और साई-फाई फिल्म ‘ऐलान’ आई, जिसका निर्देशन के. रमनलाल ने किया था। भारतीय साइंस फिक्शन फिल्मों में सबसे बड़ा योगदान और नाम 1987 में ‘शेखर कपूर’ द्वारा निर्देशित फिल्म “मिस्टर इंडिया” का रहा। इस फिल्म ने ना सिर्फ भारतीय सिनेमा पर बल्कि वैश्विक सिनेमा पर भी अपना अमिट छाप छोड़ दिया। इस फिल्म के बाद 15 सालों तक बॉलीवुड में कोई साई-फाई फिल्म नहीं आयी।

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2003 में राकेश रोशन निर्देशित फिल्म “कोई मिल गया” ने एक बार फिर से हिन्दी सिनेमा में साई-फाई फिल्मों की शुरूआत कर दी और भारतीय सिनेमा को विश्व पटल पर ले गया। 2006 में दो और साई-फाई फिल्में ‘अलग’ और ‘क्रिश’ आई। ‘अलग’ कुछ खास न कर सकी लेकिन “क्रिश” के जरिए राकेश रोशन ने एक बार फिर से साई-फाई फिल्मों में वैश्विक सिनेमा का ध्यान भारत की ओर आकर्षित कर दिया। 2008 में हैरी बवेजा निर्देशित फिल्म “लव स्टोरी 2050” आई। एक शुद्ध साई-फाई फिल्म होने के बावजूद यह फिल्म कुछ खास न कर सकी। 2009 में ‘आ देखे जरा’ और 2010 में ‘प्रिन्स’ जैसी फिल्में भी आयी लेकिन ये भी कुछ खास नहीं थी।

इस दौरान, एक बहुप्रतिक्षित फिल्म का ना केवल भारतीय सिनेमा बल्कि वैश्विक सिनेमा भी इंतजार कर रहा था। यह बहुप्रतिक्षित फिल्म थी- “रा.वन”। 2011 में ‘अनुभव सिन्हा’ द्वारा निर्देशित इस फिल्म के नायक और निर्माता दोनों शाह रूख खान थे। इस फिल्म में तकनीक के मामले में भारतीय सिनेमा को हॉलीवुड के बराबर खड़ा कर दिया। जब इस फिल्म को हॉलीवुड के निर्देशकों ने देखा तो उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि ऐसी फिल्में भी भारत में बनाई जा सकती है। हालांकि यह फिल्म भारत से ज्यादा विदेशों में सफल रही। रा.वन के बाद 2013 में ‘क्रिश-3’ ने हिन्दी सिनेमा का कद साई-फाई फिल्मों में और बढ़ा दिया।

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भारतीय सिनेमा के साई-फाई फिल्मों के पूरे इतिहास पर नजर डालें तो यह बात सामने आती है कि समय-समय पर यहां साई-फाई फिल्में बनती रही है। लेकिन, इसी के समानान्तर जब हॉलीवुड की साई-फाई फिल्मों की बात करते है तो यह भारतीय सिनेमा से 10-15 साल आगे है। भारतीय सिनेमा के इस पिछड़ेपन का विश्लेषण करें तो यहां ज्यादा साई-फाई फिल्में न बन पाने के दो मुख्य कारण है- पहली, यह कि भारतीय दर्शकों का अभी बड़ा वर्ग साई-फाई फिल्में नहीं देखता है। भारतीय सिनेमा में एक ही तरह की फॉर्मूला फिल्में बनने की वजह से भारतीय दर्शक उसके आदी हो चुके है और इससे कुछ भी अलग वो देखना पसन्द नहीं करते।

दूसरा कारण, साई-फाई फिल्मों को बनाने में आने वाली लागत है। एक अच्छी साई-फाई फिल्म बनाने के लिए काफी पैसों की जरूरत होती है और पैसे लगाने के बाद भी अगर दर्शक फिल्म देखने न जाए तो इससे निर्माताओं को काफी घाटा होता है। इसी वजह से कोई निर्माता साई-फाई फिल्मों में पैसे नहीं लगाना चाहता है। अब रा.वन की बात करें तो यह अपने समय की सबसे महंगी फिल्म थी लेकिन यह भारतीय दर्शकों को लुभाने में कामयाब न हो सकी। फिल्म के निर्माताओं को इस फिल्म के सफल होने की जितनी उम्मीद थी, उतनी सफल यह फिल्म नहीं हो पाई।

इस फिल्म के असफल होने के और भी कारण थे, जैसे- फिल्म की रिलीज में देरी होना, रोबोट फिल्म का पहले रिलीज होना, हिन्दी फिल्मों की संस्कृति और साई-फाई परिकल्पना को साथ लेकर चलने में असफल रहना। इसमें कोई दो राय नहीं है कि ‘रा.वन’ की तकनीक ‘रोबोट’ की तुलना में ज्यादा प्रभावी थी। इसका पूरा श्रेय वीएफएक्स कंपनी “रेड चिलीज वीएफएक्स” को जाता है क्योंकि भारत में अभी इतनी बढ़िया तकनीक किसी और के पास नहीं है। खुद रितिक रोशन का मानना है कि अगर ‘रेड चिलीज वीएफएक्स’ न होती तो शायद ही ‘क्रिश-3’ बन पाती।

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भारतीय फिल्मों की ही नहीं, हॉलीवुड की बहुप्रतिष्ठित फिल्म ‘अवतार’ की बात करें तो इसके वीएफएक्स का काम बेंगलुरू में किया गया है। इसकी वजह ये थी कि भारत में बेहतरीन वीएफएक्स का काम अन्य देशों के मुकाबले सस्ते में हो जाता है। हालांकि साइंस फिक्शन फिल्मों का मतलब केवल तकनीक से नहीं है। साइंस फिक्शन फिल्मों की परिभाषा की बात करें तो यह कह सकते है कि- “साइंस फिक्शन फिल्में वो फिल्में है जिनकी कहानी विज्ञान पर आधारित होती है। इस तरह की फिल्मों में कुछ ऐसी परिकल्पनाएं होती है जिसे एक दर्शक के तौर पर मानना मुश्किल या असंभव-सा होता है लेकिन फिल्म में निर्देशक के दिए गए तर्क के आगे दर्शक को उसकी बात माननी पड़ती है।”

भारतीय सिनेमा भी अब इसी धारणा के साथ सही दिशा में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है लेकिन इसकी गति धीमी है। धीमें कदमों के साथ ही एक और कदम एस. शंकर ‘रोबोट’ के सीक्वल “2.0” के साथ बढ़ा रहे है। इस फिल्म में रजनीकांत मुख्य भूमिका में है और विलेन की भूमिका अक्षय कुमार निभा रहे है। वहीं दूसरी ओर, हिन्दी सिनेमा में भी इस बात का अंदेशा लगाया जा रहा है कि जल्द ही शाह रूख खान भी रा.वन का सीक्वल बनाने की घोषणा कर सकते है बस इस बार उन्हें सही पटकथा की दरकार है। अगर इस तरह की कोशिशें भारतीय सिनेमा में लगातार होती रही, तो वो दिन दूर नहीं जब भारतीय सिनेमा और हॉलीवुड का कद एक बराबर होगा।

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