तंत्र के मन्त्र में उलझा टेलीविजन…

सितारे भौकाली

“जब अंग्रेजों ने कहा था कि भारत सांप-सपेरों का देश है तब हम भारतीयों ने इस पर खासा एतराज दर्ज किया था , भारत ने एक से बढ़कर एक ऐसे सबूत दुनिया के सामने पेश किए जिससे यह साबित हो सके कि भारत वैज्ञानिक सोच वाला एक प्रगतिशील देश है।”

 

सुप्रिया सिंह, दिल्ली।

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जब अंग्रेजों ने कहा था कि भारत सांप-सपेरों का देश है तब हम भारतीयों ने इस पर खासा एतराज दर्ज किया था , भारत ने एक से बढ़कर एक ऐसे सबूत दुनिया के सामने पेश किए जिससे यह साबित हो सके कि भारत वैज्ञानिक सोच वाला एक प्रगतिशील देश है।

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कहा जाता है कि अगर किसी देश को समझना है तो उसके टेलीविजन को देखो , वहां का टेलीविजन वहां के समाज का दर्पण होता है और उस समाज की रूचि को दिखाता है । सोचिए जरा अगर यह बात वाकई में हम वर्तमान परिदृश्य में भारतीय टेलीविजन पर लागू करे तो हमें हमारे समाज की सच्चाई दिखाने वाले शर्मनाक परिणाम से रूबरू होना पड़ेगा।

अगर हम इंटरटेंमेंट चैनल की बात करे तो टीआरपी के मामले में पहले पायदान पर रहने वाला सीरियल है – ‘नागिन 3′। यह सीरियल पूरे मिर्च-मसाले के साथ आपको अंधविश्वास और नाग-नागिन के संसार की सैर करता है।

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अगर टीवी पर अंधविश्वास का खेल यहीं समाप्त हो जाता तो शायद चिंता की बात न होती लेकिन जिस तरह चैनल लगातार अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाले शो दिखा रहे, वे समाज के लिए चिंता का सबक होना चाहिए। डायन की कल्पना के आधार को लेकर ‘नज़र’ और आत्मा और भूत-प्रेत के कॉन्सेपट को लेकर ‘कयामत की रात’ जैसे शो बिना किसी आपत्ति के बेधड़क डंके की चोट पर हर रात टीवी के जरिए पहले आपके घर फिर आपकी सोच को प्रभावित करने में लगे है। ऐसे सीरियल आम लोगों को प्रभावित भी कर रहे है और उनके अन्धविश्वास को खत्म करने के बजाए उनके मन में इसे और भरते जा रहे हैं । न जाने आए दिन कितनी महिलाओं को देश में डायन बता कर मौत के घाट उतार दिया जाता है या सार्वाजनिक रूप से उनके साथ मारपीट की जाती है।

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“संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 1987 से 2003 तक 2556 महिलाओं को डायन या चुड़ैल कहकर मार दिया गया था। इस तरह की हत्याओं के मामलों में तब झारखंड पहले, ओडिशा दूसरे और तमिलनाडु तीसरे नम्बर पर था। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के अनुसार पिछले 14 सालों में करीब 2000 महिलाओं को डायन कह कर मार डाला गया। यह स्थिति देश में तब है जब देश में डायन कुप्रथा पर कानून मौजूद है। ये आकंड़े समाज के लिए चिंता का सबक होना चाहिए कि कैसे समाज में अंधविश्वास कम होने के बजाये बढ़ता चला जा रहा है।”

अंधविश्वास फैलाने वाले अगर इन सीरियल की बात करे तो टीआरपी के मामले में ये अच्छे खासे सास-बहू के गॉसिप वाले सीरियल को भी पछाड़ रहे है। टीआरपी का मामला है शायद इसीलिए ऐसे शो की संख्या कम होने के बजाय बढ़ रही है। आने वाले कुछ दिनों में ‘तंत्र’ और ‘विषकन्या’ जैसे सीरियल भी लॉन्च होने वाले है।

टीवी के लिए आमतौर पर कहा जाता है कि “जो दिखता है, वही बिकता है”। जब ऐसे सीरियल चैनल के लिए टीआरपी की आंधी लाएंगे तो जाहिर सी बात है चैनल भी ऐसे सीरियल का तूफान तो लायगा ही।

इन सब से परे सबसे गम्भीर सवाल यह है कि आखिर लोग अब भी क्यों बड़ी संख्या में ऐसे सीरियलस को पंसद कर रहे है? इनके बेधड़क टेलीकास्ट से क्या समाज में अंधविश्वास को बढ़वा नहीं मिल रहा है ? वैज्ञानिक सोच का दावा करने वाले हम लोग क्यों अभी पूरे तरीके से इस सोच को समाज के हर भाग तक नहीं पहुंचा पाएं है?

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इन तमाम सवालों के जवाब के लिए सरकार और संस्था का मुँह ताकना खुद को धोखे में रखना होगा क्योंकि आजादी से लेकर अभी तक केन्द्रीय स्तर पर अंधविश्वास को लेकर कोई ठोस कानून नहीं है और ये स्थिति तब है जब देश के संविधान की धारा 51-ए, मानवीयता और वैज्ञानिक चितंन को बढ़ावा देने में सरकार के प्रतिबद्ध रहने की बात करती है।

सरकार पर निर्भर रहने से अच्छा है कि इस समस्या के समाधान की शुरूआत हम अपने घर से करें। हम टीवी और उस पर आने वाले ऐसे शो को देखना बंद या धीरे-धीरे कम करें। हमारी कोशिश से देर-सबेर ही सही कभी न कभी ऐसे सीरियल टीआरपी की जंग जरूर हारेंगे और जिस दिन ये सीरियल टीआरपी की जंग हारे, उस दिन हमारे समाज के प्रगतिशील सोच की जीत होगी.


लेख में लेखक के निजी विचार है।

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