सोशल मीडिया में व्यस्त, अकेलेपन से पस्त…

सोशल स्टार

विभावरी दीक्षित, भोपाल।

गाड़ियों के हॉर्न, डिस्को म्यूजिक, रोज़मर्रा की पार्टियों, क्लबिंग, सोशल मीडिया के शोर और हिप हॉप के दिखावे के नीचे हँसी, ठहाके और दिल से निकली मुस्कान कहीं दब गए हैं। इंसान की राहीसत इतनी बढ़ गयी है कि अब उसके पास हर माहौल में ढालने वाले एक नहीं, दो नहीं, बल्कि दस-दस मखौटे हैं। स्कूल में दोस्तों के साथ खेलने वाले, कॉलेज में चाय-सुट्टे का शौक करने वाले, आफिस में बैठकर सरकार को गाली देने वाले, किटि पार्टी करने वाली और मंदिर में ज़ोर ज़ोर से ताली पीटने वाले….ये सभी वो लोग हैं दहलीज़ के उस पार अपनी उम्र का मखौटा लगाकर घूमते हैं और इस पार अकेलेपन की खाई में काटते जाते हैं। बाहर से हँस रहे हैं लेकिन अंदर से खोखले हैं, जिम जा रहे हैं लेकिन शरीर में जान नहीं है, लाईक्स का अंबार है लेकिन साथ बैठकर मन हल्का करने वाला नहीं है, हर उम्र के शौक पूरे करते जा रहे है लेकिन अंदर की कला मर चुकी है।….इससे गुज़र सभी रहे हैं लेकिन कहने की इजाज़त किसी को नहीं है। अगर कहा तो.. परिवार में ढोंग कहा जायेगा, समाज में पागल कहा जायेगा और साइंस में साईको। लेकिन कोई यह नही जानता कि, दुनियाभर में 300 मिलियन से भी ज़्यादा अवसाद पीड़ितों में आप भी एक हैं।।

बॉलीवुड ने ‘डिअर ज़िन्दगी’ और ‘तारे ज़मीं पर’ जैसी फिल्में बनाकर समाज को आइना दिखाने की कोशिश तो ज़रूर की लेकिन दुर्भाग्यवश हर आम आदमी की ज़िंदगी में न तो शाहरुख खान जैसा मनोवैज्ञानिक होता है और न ही आमिर खान जैसा टीचर। मुश्किल यह नहीं है कि हम बीमार हैं बल्कि मुश्किल यह है कि हम अपनी दिक्कत को बीमारी समझते ही नहीं हैं। हम यह स्वीकार ही नहीं करना चाहते कि हम अवसाद में हैं

क्योंकि हमारी और आपकी नज़र में अवसाद एक बीमारी नहीं, पागलपन है। हमारी इस तथाकथित मॉडर्न पीढ़ी में कला-संस्कृति नहीं बल्कि झूठ की तख्त पर मखौटे बांटे जा रहे हैं।बाजार लगी है…जिसका मखौटा सबसे हंसता हुआ होगा वह सफल कहलायेगा और गलती से भी अगर आपका मखौटा गिरा और आपका अवसाद सामने आ गया तो आप बाजार में पागल कहलायेंगे।


 

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